आ गई वसंत की बहार
कोकिल कूके बार – बार
प्राची की आँगन से उठी पुकार
राष्ट्रध्वज लहराये दिग -दिगंत
वीरों का ऐसा हो वसंत.
सरसों ने बिखेरा अपना पीला रंग
जहाँ कल-कल धार बहाये गंग
खिल जाए अवनी का अंग – अंग
अपनी सच्ची वाणी सुनाए संत
वीरों का ऐसा हो वसंत.
दूर दूर तक फैले यश कीर्ति
बन जाए ऐसी ही रीति
किसान गुनगुनाए कर के खेती
फिर से निखरे अपना भारत, कंत
वीरों का ऐसा हो वसंत.