मैं साधारण परिवार की लड़की अभाव में पली -बढ़ी. उम्र जब चौबीस पार करने लगी तब परिवार में मेरे विवाह की चर्चा जोर पकड़ने लगी. बैंक बैलेंस हो या माँ का गहना -जेवर सबका ही अभाव था. सो विवाह होते – होते तीस बसंत पार हो गए.
संयुक्त परिवार में ब्याह के आई. उस परिवार में एक डॉक्टरनी चाची जी भी थीं. उनका सबके साथ स्नेह का सम्बन्ध था सो वैसा ही मेरे साथ भी, जो समय के साथ और भी प्रगाढ़ होता गया.
धीरे – धीरे संयुक्त परिवार चार – पाँच एकल परिवार में बदल गया. उनमें से एक एकल परिवार हमारा भी था,जिसमें मैं, मेरे पति, मेरे दोनो बच्चे तथा वही स्नेही डॉक्टरनी चाची. यूँ तो चाची जी स्वयं तेज तर्रार और समझदार महिला थीं. जिनके तीन बच्चे, तीनो ही महानगर में अपनी – अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी रहे थे. जब तक चाचाजी थे चाचीजी को कोई भी परेशानी नहीं थी. पर चाचाजी चाचीजी को अकेला छोड़ दिवंगत हो गए. अब एक मैं ही थी जो घरेलू महिला, बाकि सभी वर्किंग या आजाद.
फिर क्या था चाची जी को हमारे साथ आकर रहना पड़ा. चाचीजी के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी पर हमलोग बहुत साधारण आमदनी वाले. कैसे भी खींच- खाच के गृहस्थी चल रही थी. खाना- पीना के साथ साथ उनके लिए दवा, फ़ल, दूध इत्यादि का भी ध्यान रखना पड़ता जो कष्ट के साथ गुस्सा भी दिलाता था. इतने पैसे मिलते हैं, फिर भी चाचीजी को हमलोगो का कोई ख्याल नहीं आता. ऐसे ही समय बीतता गया. एक दिन शाम को चाचीजी ने इन्हें पुकारा और कहा की कल्ह शाम वर्माजी वकील साहब को बुलाते आना उनसे कुछ काम है. सुबह दफ़्तर जाते समय पतिदेव ने कहा की शाम में कुछ नाश्ता तैयार रखना मैं वर्माजी को साथ ही लेता आऊंगा. शाम हुई पतिदेव वर्माजी के साथ आए.
चाचीजी… वकील साहब आए हैं कहते हुए बाहर वाले कमरे में बैठाया, ठीक है आती हूँ कहते हुए चाचीजी कमरे में गईं. पति बाहर आ गए. चाचीजी ने दरवाजा लगा दिया, हमें कुछ अजीब लगा. ऐसी क्या बात -चीत जिसके लिए…… लगभग डेढ़ घण्टे बाद दरवाजा खुला, दोनो आदमी बाहर आए. वकील साहब चाय -नाश्ता के बाद वापस चले गए. पतिदेव सब्जी लेने बाज़ार गए और मैं साँझ-बत्ती करने लगी. चाचीजी अपने बेटे से फ़ोन पर बात कर रही थीं कि हाँ… आज वकील साहब आए थे, मैंने जायदाद के सारे कागजात उन्हें देकर सबकुछ समझा दिया है.
मेरे नहीं रहने पर तुमलोगों को कोई परेशानी नहीं होगी. अब मेरा मन हल्का हो गया. कई दिनो से इस काम के लिये मन परेशान था, ठीक से नींद भी नहीं आ रही थी. चलो बेटा बच्चों को मेरा प्यार तथा बहू को सदा सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद मेरे तरफ से दे देना. आज दिन में तुम्हारी बहनों से भी बात -चीत हो गई है. ऐसा लग रहा है कि अब सारे काम पूरे है गए. अब चलती हूँ, देखती हूँ सुनीता के पास यदि समय होगा तो जरा मंदिर होकर आऊँगी.
इतना कहकर चाचीजी ने फ़ोन रखते हुए कहा कि कई दिनों से पास वाले मंदिर जाने कि इच्छा हो रही है, समय है,चलोगी सुनीता? जी चाचीजी, चलती हूँ मैंने कहा पर मन ही मन कुढ़ रही थी कि सेवा पानी के लिए सुनीता और धन संपत्ति के लिए बेटा बहू. एक मिट्टी का दिया घी बाती के साथ लेकर चाचीजी के साथ मंदिर पहुँची. वहाँ महादेव के सामने माथा टेक कर चाचीजी कुछ देर तक बुदबूदाती रहीं. फिर सजल नेत्रों से मुझे देखते हुए बोलीं चल सुनीता घर चलती हूँ.
हम दोनों जनी घर आ गए. दो कप चाय लेकर चाचीजी के पास आ बैठी. उन्होंने मेरे दोनो हाथ अपने हाथों में लेकर कहने लगीं कि जरुर पिछले जन्मदिन का कोई नाता मेरा तुम्हारा रहा होगा तभी दूर की चाची सास की सेवा -सुश्रुषा तू ने इतना तन- मन से किया. इसके लिए मैं तुम्हारी आभारी हूँ और इस आभार के साथ ही इस दुनिया से बिदा हो जाऊँगी.ईश्वर से मेरी यही प्रार्थना है कि अगले जन्म में हमदोनो माँ बेटी के रुप में मिलें. मैं धीरे से मुस्कुरा उठी. चाय पीते हैं ठंढी हो रही है कहते हुए हमदोनो ने चाय पीया. तबतक पतिदेव भी आ गए. मैं उठकर रसोई में चली गई. भोजन बना, सबने खाया पर चाचीजी ने नहीं. उन्होंने कहा मुझे एक गिलास ठंढा पानी पिला दो बस.
सुबह लगभग पाँच बजे जगने वाली चाचीजी अभी छः बजे तक भी उठकर नहीं आईं तो मैं उनके पास गई. चाचीजी अपने बिस्तर पर बैठी तुलसी माला लेकर कुछ जाप कर रही थीं. मेरी पदचाप सुनते ही उन्होंने कहा आ गई, तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी. उन्होंने अपने हाथ का माला बगल में रखकर मेरा माथा चूमा और कहा सदा ख़ुश रहो. इतना कहते ही उनकी आँखें बंद होने लगीं. मैं जोर से चिल्लाई, पतिदेव, बच्चे सभी दौड़ कर आए तबतक चाचीजी शांत हो चुकी थीं. पड़ोस में ही डॉ. अग्रवाल थे, उन्हें बुलाया गया. आकर देखा, कहा कि आपकी चाचीजी ने इस दुनिया से विदा ले लिया. हमसभी हतप्रभ. ऐसा कैसे? सबकुछ इतने अच्छे से कर -करा के इतना झट पट कैसे?
उनके बच्चों को सन्देश भिजवाया, सभी आए, सारे कार्यक्रम अच्छे से पूरे हो गए.
कल्ह होकर सुबह सबको वापस जाना था तभी वकील साहब आए, उनके हाथ में एक सूटकेस था. सभी उनके पास आ गए. वकील साहब ने कहा कि महरूम सावित्री देवी ने अपने सारे गहने सुनीता जी कि बेटी माला को दिया है साथ ही अपनी सारी चल अचल संपत्ति सुनीता के नाम कर गई हैं, क्या किसी को कोई आपत्ति? चाचीजी के तीनो बच्चों ने कहा नहीं, हमें पहले से ही सबकुछ माँ ने बता दिया था.
फिर वकील साहब ने एक कागज का टुकड़ा निकला और पढकर सुनाया, प्रिय सुनीता, तुमने जो मेरे लिए किया है वह अपनी सगी बेटी भी नहीं कर सकती. तंगहाली में रहने के बाद भी तुमने मेरे लिए कभी किसी चीज क़ी कमी नहीं क़ी. यदि मांगने से ईश्वर कुछ देता है तो मैं उनसे यही माँगती हूँ कि अगले जन्म में हमदोनो को माँ बेटी बना कर इस दुनियाँ में भेजे. सदा ख़ुश रहो…. तुम्हारी चाचीजी. वकील साहब के किसी भी बात पर किसी ने कोई आपत्ति नहीं की. चाचीजी की बेटी शैलजा तो गले लगकर रोते हुए कहने लागी की माँ ने तो हमारे लिए फिर से एक मायका बना दिया. अब से छुट्टियों में हमदोनो बहन अपने बच्चों के साथ यहीं आया करुँगी.
मैं चाचीजी की तस्वीर के सामने बैठी बुदबूदाती रही कि आपके द्वारा ली गई परीक्षा, मैं इसलिए पास कर गई की उसकी परिक्षक आप थीं.
