Post navigation जिंदगीवृद्धावस्था सुबह से ही पता नहीं क्यों मन उदास था. सधी हुई दिनचर्या के साथ शाम हो गई पर मन अभी भी वहीं…. क्या करूँ…. कहाँ जाऊँ…. किससे कहूँ….. समझ नहीं आ रहा था.हुआ यूँ कि कल्ह शाम में माँ से बातें हुईं. माँ की आवाज कुछ उदास – शान्त सी थी. पूछने पर उन्होंने कहा… कुछ भी नहीं. ऐसे ही…. दिन अब नहीं कट रहे. अब कहीं भी, कुछ भी और कहूँ तो कोई भी मुझे अच्छा नहीं लग रहा. किसी से मिलकर कुछ देर तो ठीक पर, कुछ ही समय बाद दिल अकेला हो जाना चाहता. पता नहीं ईश्वर के घर में मेरे लिए जगह क्यों नहीं……?माँ की इन सारी बातों से मेरा मन भी आहत हो गया.सारे दिन मैं यही सोचती रही……… क्या वृद्धावस्था जीवन की सबसे क्रूर अवस्था है? जिसमें मनुष्य अपने आपको धरती का बोझ, रिश्ते खोखले, स्वास्थ्य और स्वाद बेमतलब का मानने लगता. माँ सरकारी सेवा में थीं. सेवनिवृत्ति के बाद उन्हें फुरसत के क्षण मिले पर बीमारी ने उसे अपना ग्रास बना लिया. फिर तो धीरे -धीरे समाज में उठना- बैठना, नाते -रिश्तेदारों के यहाँ आना -जाना सब छुट गया. यहाँ तक कि अपने घरेलू काम भी छुट गए. जो कि कभी बड़े ही चाव से खुशी -खुशी किये जाते थे. अब उनके जीवन में समय आ गया कि उन्हें एक बेशकीमती फर्नीचर की तरह सजा कर रखा जाने लगा.उनके स्वास्थ्य और जरुरत को देखते हुए नियमित दिनचर्या तय हो गए. खाने -पीने से ले कर पहनने -ओढ़ने तक की उत्तम व्यवस्था कर दी गई.दूध के समय दूध तो सूप के समय सूप. इस देख-रेख में इच्छा -अनिच्छा का धयान रखना कठिन हो गया.वृद्ध व्यक्ति की देख -रेख तो करनेवाले वाकई बहुत करते हैं पर वह ये भूल जाते हैं कि यह हमेशा वृद्ध नहीं था.यह भी कभी बच्चा /बच्ची रही होंगी, युवावस्था भी आई होगी जो मनमानी करने के लिए. फिर जवाबदेही निर्वाह में अपने को पूरी तरह भूल जाने वाले आज इस अवस्था तक पहुँचे होंगे.इनके अंदर जो अरमान आधे -अधूरे रह गए होंगे वो मचल कर बाहर आ जाना चाहता होगा.हमसब सुख – सुविधा को इतना तरजीह दे देते हैं कि वह वृद्ध उसमें उलझ कर बेचैन हो जाता है. फिर वह अपने आपको अस्तित्वहीन, अनुपयोगी समझ उदासीन जीवन बीताने पर मजबूर हो जाता है.