
लक्ष्मी….. लक्ष्मी…. कहाँ हो? सुनते ही लक्ष्मी आई. जी माँ जी…… सुनो बच्चे स्कूल चले गए. अब तुम झटपट तैयार हो जाओ उर्मिला जी के घर चलना है.
जी… पर माँ जी वहाँ तो कल्ह रात को ही जाना था…. कल्ह पार्टी थी… फिर आज?
अरे पगली…. यदि मैं कल्ह चली गई होती तो, तू नहीं जा पाती. मेरा बेटा ललित अभी लौटा नहीं था, और आ भी गया होता तो भी तुम नहीं जाती उसे छोड़कर. मैं तुम्हारे बिना जाऊँगी नहीं.. यह तो मैंने पहले से ही सोच रक्खा है..
आज चलूँगी, दुल्हन को देखूँगी, तुम्हारी भी उससे जन पहचान हो जाएगी. बच्चों के लौटने तक हमलोग भी आ जाएंगे.
अब चलो जल्दी से तैयार हो जाओ इतना कहते ही विमला जी भी जो पहले से ही स्नान ध्यान बैठी थीं, तैयार होने के लिए उठ खड़ी हुईं.
अपनी अलमारी खोल साड़ी निकाल रही थीं तभी उनकी नजर एक गुलाबी रंग की साड़ी पर पड़ी. उसको हाथ में लेते ही वह अतीत में पहुँच गई…..

विमला…. विमला… देखो ये तुम्हारे लिए क्या लाया हूँ… पैकेट से एक गुलाबी साड़ी निकाल कर विमल बाबु ने दिया. मारे खुशी के मैं खिल गई.
मेरे मनपसंद रंग की इतनी प्यारी साड़ी, सच मैं बहुत ख़ुश थी.
तभी आवाज आई….. बहू जिसके घर में ब्याह के लिए लड़की हो वह रोज रोज नई साड़ी नहीं पहनती. रख दो इसे, अगले महिने तुम्हारे ननद की शादी है, उसे लेने देने में कम आएगा. मैं चुपचाप पाती की ओर देखी और साड़ी उठाकर सासु माँ के हाथ में दे दी.
ननद के ब्याह की तैयारी में मैंने ख़ुद ही बढ़ चढ़ कर हिस्सा ली. मेरे पास के समानों में से जो भी उन्हें पसंद था, मैंने सब उन्हें दे दिया. पति का हाथ तंग होने के कारण मैंने अपने सारे जेवर भी दे दिए, फिर भी सासु माँ की बातें….. दिल को लग गईं.
समय पर बारात आई, धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ. ननद रानी जो हमसबको बहुत प्यारी थीं, विदा होकर ससुराल चली गईं.
अगले रोज उनके यहाँ रिसेप्शन पार्टी थी. लोकल होने के चलते तय हुआ कि सेम डे शाम को सभी एक ही साथ चलेंगे.
शाम हुई, सभी जाने की तैयारी में लग गए. मैं भी सुन्दर से तैयार होकर सासु माँ को दिखाने आई, मैं कैसी लग रही हूँ माँ जी…. उन्होंने घूम कर देखा और कहा.. तुम? सभी चले जाएंगे तो घर पर कौन रहेगा? तबतक पतिदेव भी आ गए, उन्होंने कहा दो तीन घण्टे की तो बात है… ताला लगा लेंगे.. और क्या. सासुमाँ ने कहा ऐसा करो.. तुमलोग जाओ, मैं राह जाती हूँ.
मैं वहाँ से हट कर अपने कमरे में आई, कपड़े बदली.
माँ जी से पूछी आप वहाँ से भोजन कर के आएंगी या घर आकर करेंगी? जवाब मिला मेरे लिए रोटी बना देना मैं वही खा लूँगी, तुम अपने लिए हो चाहो बना लो.
पतिदेव रसोई में आए…. तुमको मैं किसी और दिन वहाँ पहुँचा दूँगा.
समय बीता पर वो समय कभी नहीं आया जब मुझे वहाँ भेजा गया हो.
लगभग दो साल बाद मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई.
ननद रानी नन्दोई जी के साथ आईं. बच्चे का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया. बच्चे को फुआ ने स्नेह आशीष के साथ बहुत सारा सामान भी दीं. अब जाने का समय हुआ तो मेरे पास हाथ में एक पैकेट लिए आईं और उसमें से साड़ी निकाल कर मुझे देते हुए बोलीं, भाभी इन्हें पिंक कलर बिल्कुल पसंद नहीं. एक रोज मैं इसे पहनी थी, ये आते ही बोले, इसे बदल कर कोई दूसरी साड़ी पहन लो. मुझे यह रंग बिल्कुल पसंद नहीं. तब से यह साड़ी मेरी अलमारी में पड़ी हुई है.
आप यह लेलें.
मन को पुनः एक धक्का लगा. मेरे लिए यह अनमोल साड़ी थी जिसे बेमोल कर दिया गया.
मैंने अपने बेटे को चूमा और ख़ुद से एक वादा किया कि अपनी बहू को कभी भी इन सब समस्याओ से रू -ब -रू नहीं होने दूँगी.
तभी लक्ष्मी मेरे बगल में आ खड़ी हुई. कैसी लग रही हूँ… माँ जी…
बिल्कुल नई नवेली दुल्हन के समान कहते हुए उसे अपने गले लगा लिया.
ध्यान आया कि ख़ुद से किया गया वादा अब शायद पूरा होने लगा है.
