मिस्टर सक्सेना घर में आते ही सोफे पर निढाल होकर गिर पड़े. उनकी श्रीमती पार्वती देवी उनके पास आईं, पानी पिलाईं और कहने लगीं… क्यों परेशान होना, जो कल्ह होना था वो आज हो गया. ठीक ही तो है अपने जीते जी सारी जवाबदेही पूरी हो गई. बिना कुछ बोले सक्सेना जी अंदर कमरे में चले गए. लक्ष्मी जी चुपचाप बैठी रहीं.
उन्हें याद आ रहा था कि……
सुबह का समय था, मुझे उल्टी आ रही थी. सासु माँ घबड़ा रही थीं. जल्दी – जल्दी मुझे हॉस्पिटल ले जाया गया, वहाँ डॉ ने खुशखबरी बताई पर साथ ही ये भी कहा गया कि पूरे नौ महिने इनका बहुत ध्यान रखने की जरुरत है. कारण कि गर्भधारण मेरे लिए औरों की तुलना में अधिक जोखिम भरा है. परिवार में सभी इसके खिलाफ थे पर मैं मर कर भी इस जोखिम को उठाने को तैयार थी. काफ़ी तर्क – वितर्क के बाद यह तय हुआ की इसके बाद दूसरा नहीं होगा. और यह भी तय हुआ कि लड़का होगा तो एक लड़की और लड़की होगी तो एक लड़के को गोद ले लिया जाएगा.
बहुत कठिनाई से नौ महिने का समय गुजरा. ऑपरेशन से एक बेटे की माँ बनी. पूरे घर में हर्ष की लहर दौड़ गई. पर उसके साथ ही कुछ बुरा भी हो गया. मेरा बायां पैर लकवाग्रस्त हो गया. लम्बे इलाज, व्यायाम के बाद लगभग सात वर्षों के बाद मेरे पैर ठीक हुए, मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकी.
अब मैं पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थी.
बीमार रहने के कारण मेरा बेटा आरव अपनी दादी माँ के सान्निध्य में ज्यादा रहा.
अब आरव आठ साल का हो चुका था.
हमदोनो पति- पत्नी सासु माँ की आज्ञा से अपने ही शहर के अनाथालय से एक नन्ही परी को गोद ले आए.हमारा परिवार पूर्ण रूप से पूरा हो गया. पर, परी को दादी माँ का प्यार अधिक दिनों तक नसीब नहीं था. वह दो वर्ष की हुई तब तक सासु माँ दिवंगत हो गईं.
मैं अपने पति और दोनों बच्चों के साथ दुनिया की सबसे सुखी महिला के रूप में जी रही थी. बेटे के समय उसके लालन – पालन का सुख नहीं उठा सकने के कारण परी में डूब गई थी.
समय पँख लगाकर उड़ता रहा. बच्चे भी सफलता हासिल करते हुए अपनी अच्छी जगह बना लिए. बेटा विदेशी फर्म में इंजिनियर के पद पर चला गया और बेटी सरकारी चिकित्सालय में चिकित्सक के रूप में कार्य करने लगी.
हमारी खुशियाँ दुगुनी -चौगुनी हो चुकी थीं तभी समय ने करवट ली…. बेटा हमें बिना बताए ही वहीं की एक लड़की से विवाह बन्धन में बंध गया.
बेटी परी से पूछने पर उसने कहा आप जहाँ ठीक समझे, मेरा विवाह कर दें. उसका सहकर्मी पियूष हमें पसंद था, हमने उसी के साथ उसका विवाह कर दिया.
विदाई के बाद शाम को चाय के समय आरव ने कहा, पिताजी.. आप अपनी संपत्ति मुझे अभी ही दे दें. मैं अभी एक सप्ताह और हूँ. अगले सप्ताह मेरी फ्लाइट है.चाहता हूँ कि जो होना है, अभी हो जाए. इस समय का सदुपयोग भी हो जाएगा.
ठीक है, पगफेरे में परी आती है तो उसी समय वकील साहब को बुला कर सारी बात कर लेते हैं.
परी आई, वकील साहब को बुलाया गया. सारी बातें हुईं. परी कुछ भी लेने से इनकार रही. फिर अपनी चल-अचल सारी संपत्ति बेटे आरव के नाम कर दिया गया. अपने लिए अपना पेंशन, यह मकान, और मेरे नाम का एक डिपाजिट रख लिया गया.
अभी लगभग एक सप्ताह पहले बेटे का फ़ोन आया…. पापा, आपने जो भी प्रॉपर्टी मुझे दिया था उसे बेच कर मैंने यहाँ अमेरिका में अपने लिए तीन कमरे वाला एक फ्लैट ले लिया है. अब मैं यहीं का निवासी हो जाऊँगा, हमेशा के लिए. मुझे अब इंडिया नहीं आना है. अब आपलोगों के अंतिम संस्कार के समय ही आ पाऊँगा.
ठीक है बेटा कहते हुए होंठ और हाथ दोनों काँप रहे थे. मैं उनके हाथ से उनका मोबाइल फ़ोन लेकर टेबल पर रख दी और पूछी क्या हुआ…. कुछ नहीं…
तुम एक कप चाय दे दो, मुझे किसी से मिलने जाना है.
चाय पीकर चले गए, दो घण्टे बाद आए. चेहरे पर शान्ति के साथ- साथ कठोरता चिपकी हुई थी. पूछने पर बताए कि हमने,अपने मतलब मेरे और तुम्हारे अंतिम संस्कार का इंतजाम कर लिया. अब मैं और तुम चैन से मर सकेंगे. कौन कब आएगा और…
कल्ह जाकर अपने और तुम्हारे नाम का पैसा जमा करा दूँगा और निश्चिंत हो जाऊँगा. उस संस्था से प्रतिदिन चार से पाँच कॉल आएगी. जिस दिन उनके कॉल पिक नहीं होंगे, वे समझ जाएंगे और आकर हमारे अंतिम संस्कार कर जाएंगे. मैंने परी को भी सब बता दिया है. वह तो पहले नाराज हुई, रोई. बहुत समझाने पर मानी. संस्था को परी का और परी को संस्था का कांटेक्ट नम्बर दे दिया हूँ. अंतिम संस्कार के पहले संस्था वाले उसे इन्फॉर्म कर देंगे. परी ने कहा कि अपना मकान उन्हें दे दें. आपके बाद वो इसका उपयोग असहायों के लिए करेंगे. उसकी बात मुझे ठीक लगी और मैंने वैसा ही कर दिया. अभी वो आती ही होगी. उसका तबादला हो गया है, अगले सप्ताह वह दूसरे शहर चली जाएगी. तभी परी और पीयूष आए. अच्छा लगा, जाते समय परी भावूक हो गई. हमारी आँखें भी गीली हो गईं.
तभी,लक्ष्मी… आवाज सुनकर लक्ष्मी कमरे में गई. सक्सेना साहब गोद में तकिया लिए बैठे थे. जाते ही बोले अब तो सारे काम पूरे हो गए. चलो अब हम भी चलते हैं कहते हुए लक्ष्मी जी का हाथ अपने हाथ में ले लिए. दोनों ने अपने सिर से एकदूसरे के सिर को सहारा दिया और नए सफर पर निकल गए.
