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दुल्हिन…. ए दुल्हिन एक महीन, फीकी, कमजोर सी आवाज सुबह सात बजे से पहले प्रतिदिन हमारे दरवाजे पर आती. माँ जातीं, दरवाजा खोलतीं, आदर के साथ उस बूढ़ी महिला को लाकर आँगन में पीढ़ा पर बैठातीं. चाय का कप पकड़ाते हुए भाभी को कहतीं इनको खाना खिला देना. खाने में आम का अचार देना नहीं भूलना कहती हुई माँ स्नान – धयान के लिए चली जातीं. यह उनका दैनिक कार्य था.

मालिन बेचारी चाय की प्याली सामने देखतीं पर तब तक उठा कर घूंट नहीं भरतीं जब तक उनके हाथ से फूल की पुड़िया नहीं ले लिया जाता. नाटे कद की महिला मैली -कूचेली साड़ी, काले और मोटे फ्रेम वाला चश्मा जिसके एक डंडी की जगह सुतरी बाँध कर कान में फंसाया हुआ, साथ ही सहारे के लिए हाथ में एक लाठी, झुकी हुई कमर और कराहती आवाज जब तक कानों में नहीं पड़ती, हमारे लिए सुबह के सात नहीं बजते.

कुहरा हो या बादल या घनघोर वर्षा. पाँच -सात मिनट आगे -पीछे हो जाय तो बड़ी बात. मालिन का माँ के साथ बड़ा ही आत्मीय सम्बन्ध जिसका निर्वाह भाभी भी किया करतीं. मालिन इसे अपना अधिकार समझ भाभी पर हुकूमत भी चलातीं. भाभी के कामों में गलती निकलना और फिर उनके माता – पिता को मज़ाक में गाली, और हम सबका मिलकर हँसना, चलता रहता. जबतक मालिन भोजन करतीं, हमसब भाई बहन उन्हें घेरे रहते, हँसी -मज़ाक का दौर चलता रहता.

जाते समय भाभी को ढेरों आशीर्वाद के साथ माफ़ी भी कि मेरी बातों का बुरा न मानना, कल्ह फिर आऊँगी. मालिन हमारे घर चावल, गेहूँ साफ़ करने जैसा काम करतीं, अपनी राय भी देतीं, अपने को हमारे परिवार का हिस्सा मान अधिकार भी दिखातीं, जो बुरा नहीं लगता.

एक शाम को आईं. भाभी ने पूछ लिया इस समय कैसे? बुरा लगा, लौट कर जाने लगीं. रोकने और मानने के उपरांत रोते हुए बोलीं मुझे यहाँ जो बात -व्यवहार मिलता है वह तो मुझे अपने घर में भी नहीं मिलता. यही बात आज मैं अपने घर में बोली हूँ तो उन्होंने कहा कि वे लोग आप पर दया करते हैं. आप उनकी कोई अपनी नहीं हैं. वो तो आप वहाँ फूल देने जाती हैं, गरीब हैं, इसीलिए वे लोग आपकी सहायता कर देते हैं. जब आपने मुझसे कहा कि इस समय कैसे तो मुझे लगा, बेटे ने ठीक ही कहा है. मुझे अपना नहीं समझा जाता बल्कि मुझपर दया की जाती है.

यदि आप मुझ पर, मेरी गरीबी पर, दया कर धयान रखते हैं तो आज से न करें. मुझे यह पसंद नहीं. मैं आपके यहाँ फूल देती हूँ, बदले में मुझे पैसे मिलते हैं, बस्स.. आज से मैं…. कहती हुई जाने लगीं. भाभी ने रोका.. नहीं.. नहीं.. मालिन चाची.. ऐसा नहीं है… आप हमसब का धयान रखती हैं, छोटे -मोटे काम में हमारा सहयोग करती हैं. आपको हमसे अपनापन है, हमें भी है. इसमें दया और गरीब वाली कोई बात नहीं है.

सीधी -सरल मालिन आँचल से अपने आँख पोछती हुई बैठ गई. उस समय उसके चेहरे पर विश्वास के भाव स्पष्ट दिख रहे थे.
भाभी दाल वाली पूड़ी, कोहड़ा की सब्जी, आम का अचार थाली में परोस लाई, मालिन का हाथ पकड़ पीढ़ा पर बैठाकर उनके सामने बढ़ा दीं. सुबह -सुबह मालिन का बेटा आकर बता गया कि मालिन नहीं रही.

अंतिम दर्शन को हमसब पहुँचे. एक नई साड़ी में लिपटी नीचे सुलाई हुई. ये वही साड़ी थी जो भाभी ने खिचड़ी पर दिया था. लेते समय बोली थी.. इसे बक्से में रख दूँगी. पता. नहीं कब मर जाऊँ. उस समय घर में नई साड़ी हो न हो, उस समय काम आएगा.
अंतिम यात्रा के वक़्त मालिन के चेहरे पर एक तृप्त मुस्कान विद्यमान था.

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