शाम का समय था, हम सभी चाय पी रहे थे तभी बाहर से हो हल्ले की आवाज आई. मानव स्वभाव, मैं भी देखने चली गई. वहाँ एक युवती 28-30 वर्ष की, लगभग 6 साल की एक बच्ची का हाथ पकड़े चुपचाप सबकी बातें सुन रही थी. सबके चुप हो जाने पर उसने कहा कि अब मेरी भी सुन लें, फिर अपना फैसला दें. उसने कहना शुरू किया…. मेरा नाम सुषमा है. यह मेरी बेटी श्यामली है. आज से लगभग 8-9 वर्ष पहले इस कहानी की शुरुआत हुई थी. मैं अपनी बूढ़ी माँ के साथ दिल्ली, मुख़र्जी नगर में दो कमरे के मकान में रहती थी. हमारी कुल चल – अचल संपत्ति उतनी ही थी.
वहीं बगल में सुशील बाबु किराये का एक कमरा लेकर रहते थे, जहाँ अपनी पढ़ाई के साथ – साथ अपना खर्च निकालने के लिए होम ट्यूटर का काम भी करते थे. मैं भी ग्रेजुएशन कर रही थी और माँ जीविकोपार्जन के लिए टिफिन वाला काम. एक सुबह माँ टिफिन लेकर सुशील के कमरे पर गई तो वो कराहते हुए दरवाजा खोले. माँ ने पूछा क्या हुआ? जवाब मिला कल्ह दोपहर से ही बुखार लग रही है. टिफिन रख माँ वापस आई और बोली सुशील बाबु की तबीयत कुछ ज्यादा ही ख़राब लग रही है. उनके घर में कोई है भी नहीं जिसे वो बुला सकें. माँ की बात सुन मैं ने कहा अच्छा ठीक है,आपसे जो बन पड़े कर दीजिये.मैं भी आपकी हेल्प कर दूँगी, इतना कह मैं कॉलेज चली गई. दोपहर को लौटी तो पता चला माँ सुशील को लेकर हॉस्पिटल गई हैं. वहाँ जाने पर पता चला कि उन्हें डेंगू हो गया है. डॉ ने एडमिट कर लिया. एक सप्ताह बाद डिस्चार्ज हो, घर लौटे. इतने दिनों में वो भी हमारे परिवार के एक सदस्य जैसे हो गए थे.
विचार हुआ आपका भी दूसरा कोई नहीं, हम माँ बेटी का भी और कोई नहीं. तो फिर हम इकट्ठे ही रहें. सहमति बनी और हम लोग रहने लगे. कुछ महीनों के बाद सुशील ने माँ के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि बुरा ना माने तो आप मेरा और सुषमा को विवाह बन्धन में बाँध दें. उनका यह प्रस्ताव सुन मुझे अच्छा लगा, माँ ने भी सोचा कि एक ना एक दिन तो बेटी ब्याहना ही है, फिर ये तो देखा – समझा लड़का है.
हमदोनो परिणय सूत्र में बंध गए. अब माँ मेरे साथ सुशील का भी खर्च उठाने लगी. मेरा ग्रेजुएशन पूरा हो गया और मैं माँ के कामों में उनकी मदद करने लगी. इसी बीच हमारी बिटिया का जन्म हुआ. माँ बीमार चलने लगी. घर में खर्च अधिक और आमदनी कम. एक दिन सुशील आकर बोले कि एक कंपनी में मेरी जॉब लग गई है. हमलोग ख़ुश हो गए. कंपनी के काम से सुशील प्रायः बाहर जाते रहते थे. बीमार माँ चल बसी. माँ के दुख से अभी मैं उबरी भी ना थी कि एक दिन सुशील ने कहा मेरा ट्रांसफर हो गया है, जाना होगा अहमदाबाद. मैं कल्ह वहाँ के लिए निकलूँगा. वहाँ जाकर रहने की व्यवस्था कर तुम्हें ले जाऊँगा.” ठीक है “उदास मन से मै ने कहा. सुशील चले गए. जाने के बाद उन्होंने ना तो कोई खोज खबर ली और ना ही आये. जाने के बाद से ही उनका फ़ोन भी बन्द आने लगा था. लगभग 6महीने बीत जाने पर मैं उनके पुराने कंपनी गई, वहाँ पता लगा की उन्होंने जॉब छोड़ दी थी,क्यों की उनकी गवर्नमेंट जॉब हो गई थी.
मैं चुपचाप घर वापस आ गई और अपनी माँ के पुराने काम को करने लगी. एक दिन टिफिन लेकर मैं देने गई तो देखी की एक नई लड़की निशा लैपटॉप पर वीडियो कॉल पर अपने मामा से बात कर रही थी. मैंने पूछा कौन है मामा हैं कहकर मेरे हाथ से टिफिन लेकर रखने लगी, मैंने स्क्रीन पर देखा तो वह सुशील थे. कल्ह होकर गई तो मैंने उस लड़की से पूछा तुम्हारे मामा कहाँ रहते हैं?ऋषिकेश में रहते हैं, वहीं तहसीलदार हैं, उसने बताया.
फिर मैंने उनका एड्रेस पता किया और यहाँ तक पहुँची हूँ.आपलोग उनके घर तक मुझे पहुँचा दें,मैं उनसे कुछ बातें कर लूँगी और लौट जाऊँगी. सबने एक स्वर में कहा यदि यह सच है तो सुशील बाबु को इसका जवाब देना पड़ेगा. तभी एक बूढ़ी महिला आगे बढ़ी और बोली उस नाते तो तुम हमारे कूल की बहू हो. आओ मैं चलती हूँ तुम्हारे साथ. वह आएगा क्यूँ क़ि कल्ह छुट्टी है. सुषमा और श्यामली को साथ लिए वह बूढ़ी महिला आगे बढ़ गई.
मैंने अपने पति से पूछा की क्या यह सब सच है? पति ने कहा हो सकता है. सुशील बचपन से ही मतलब परस्त लड़का था. देखो,दादी घर में अकेली कैसे रहेगी और शहर में इनका मन नहीं लगेगा के नाम पर मंदिर में रख बीवी बच्चे के साथ सरकारी क्वार्टर में रहने चला गया.
रविवार का दिन, मेरे पति उस ईलाके क सबसे अच्छे वकील, जिसके चलते सुबह से ही लोगों का आना – जाना लगा रहता था सो आज भी वही लोगों का आना – जाना तभी, सुषमा सुशील की दादी संग आई, कुछ देर मेरे पति से बात – चीत क़ी फिर उनको अपने घर लिवा ले गई.
पति ने वहाँ से लौटने ले बाद बताया की सुशील जब दिल्ली में रहकर तैयारी कर रहा था उस वक़्त उसकी माली हालत ठीक नहीं थी. वैसे में जब उसे सुषमा की माँ का साथ मिला तो उसका उपयोग कर अपना रास्ता बना लिया. सिविल सर्विस की परीक्षा पास करने पर बहाना बना कर वहाँ से निकल लिया. यहाँ आकर अपनी नई दुनियाँ बसा लिया. माँ तो बचपन में ही चली गई थी पिताजी भी चल बसे. फिर दादी को बाहर कर संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया. वो तो कहो की उसकी दादी समझदार थी जो सुशील की बातों में ना आई.नहीं तो आज उसे भूखे मरना पड़ता. बूढ़ी दादी ने कहा की मैं अपनी संपत्ति सुषमा के नाम कर दूँगी और हम तीनों यहीं रहेंगे.
सुशील चुपचाप इस फैसले को मान लिया किन्तु,सुषमा ने कहा कि नहीं मुझे कोई संपत्ति नहीं चाहिए और ना ही मैं यहाँ रहूँगी. दादी भी मेरे साथ चलेंगी, हम तीनों वहीं एक साथ रहेंगे. श्यामली को उसके पिता का प्यार मिलना चाहिए इसलिए जब – जब संभव हो सुशील आएं, श्यामली क साथ समय व्यतीत करें, उसके स्कूल में जरुरत अनुसार पिता के हैसियत से जाएं.
हाँ ये बात सच है कि मैं अपनी बेटी को सिखाऊंगी कि भावना में ना बहना. कल्ह होकर सुषमा, श्यामली और दादी दिल्ली के लिए रवाना हो गए.
