Sat. Oct 10th, 2026

ले-लो, ले-लो  रक्त वर्धक,बथुआ, पालक.या फिर ले लो चुकंदर,जो बनाता है खून,जा के अंदर……प्रतिदिन इस गीतनुमा पुकार को सुनती पर कभी भी उसपर ध्यान नहीं देती…तबतक वही मीठी आवाज..ले-लो, ले-लो  लाल हरे गाजर, मटर और टमाटर.. फिर गुंजी. उस आवाज में कुछ तो है….सो…आज इच्छा हुई… देखूँ जरा..यह कौन है जो इतना मीठा गाकर सब्जियाँ बेचता है. खिड़की से झाँक कर देखने का प्रयास की पर सफल नहीं हुई तो छत पर चली गई. फिर भी….तब बाहर जाकर देखने की जरुरत पड़ी,गई….वहाँ जाकर जो पता चला, ओह….यह सब्जी बेचनेवाला सागर जो पाँचवी कक्षा का छात्र और अपने माता- पिता की चार संतान में सबसे बड़ा. इसके पीछे दो बहन और एक भाई जिनकी उम्र क्रमशः 8,6 और 3 वर्ष थी. सागर के ही स्कूल में उसकी दोनों बहन सुषमा और सीमा तीसरी और पहली कक्षा में पढ़ती थीं. भाई शिवम् जो कि छोटा था और गूंगा भी, जिस कारण वह पढ़ने नहीं जाता.सागर के पिता क़ी एक छोटी सी बुकशॉप थी जो किराए क़ी. उसकी माँ गीता और पिता गौरीशंकर मिलजुल कर चलाते. छः व्यक्ति का परिवार अपने छोटे से मकान में आनंदपूर्वक रहते.एक दिन गौरीशंकर के जबड़े में दर्द हुआ, डॉ को दिखाया गया. डॉ ने माउथकैंसर बताया. साथ ही कारण बताया कि बहुत अधिक पान मसाला का सेवन इस बीमारी को जन्म देता है. गीता सिर पर हाथ रख कर बैठ गई. दोनों पति-पत्नी में इस बात को लेकर  पहले कई बार लड़ाई भी हो चुकी थी.अब अस्पताल, जाँच – पड़ताल का चक्कर शुरू हो गया. इस आपा -धापी में दुकान बन्द रहने लगी. फिर दुकान का मालिक उसमें अपना ताला लगा दिया.गीता पति के इलाज में भटकने लगी और बेचारे इस सागर और इसकी बहनों का भी स्कूल छुट गया.एक दिन गीता घर आई और बोली कि जल्दी से खाना बना देती हूँ, फिर चली जाऊँगी. इतने में अस्पताल से खबर आई कि आपके पति की तबीयत बिगड़ गई है ,जल्दी आएं. बेचारी दौड़ती -दौड़ती सिढ़ी पर चढ़ रही थी तभी किसी ने कहा.. कहाँ चली गई थी तुम्हें ही पूछते -पूछते  तुम्हारा पति इस दुनिया से चला गया…..इसे सुनते ही उसके पाँव लड़खड़ाए और वहीं सिढ़ी से लुढ़कते हुए नीचे गिरी और गिरते ही परलोक चली गई.ईधर सागर माँ को दौड़ते देखा तो वह भी उनके पीछे दौड़ा और गिर पड़ा. उसकी कमर में हल्का फ्रैक्चर आया. इलाज संभव नहीं, फलस्वरूप कमर से वह जीवन भर के लिए झुक गया.विधाता खुशी देते समय छप्पर भले ही न फाड़े पर विपदा के समय अपना दिल खोल देता है.माँ – पिता दोनों चले गए तो अब अपने तीनों भाई-बहन की जिम्मेदारी इस बच्चे सागर पर आ गई.अभी उनका दर्द पुराना भी नहीं हुआ था कि एक दिन अचानक कुछ लोग आए और कहने लगे…. तुम्हारी माँ ने यह मकान हमारे पास गिरवी रख दिया था. अब तो वह रही नहीं तो पैसे कौन चुकाएगा? इसलिए तुमलोगो इसे खाली कर दो.काफ़ी हाथ -पैर जोड़ने, गिड़गिड़ाने के बाद एक साल का समय मिला. तब से सागर सुबह में सब्जी बेचता, दिन के दस बजे से शाम छः बजे तक एक मॉल में काम करता. फिर सात बजे से रात दस बजे तक एक व्यवसायी के यहाँ आँटा का पैकेट तैयार करता. उसी व्यवसायी का सब्जी का भी व्यवसाय था. सागर की मेहनत और ईमानदारी को देखकर उन्होंने ही उसे सलाह दिया कि मेरे पास से सब्जी ले जाकर सुबह घूमा -घूमा कर बेचो, फिर काम पर चले जाओ और जब मेरे पास आओ तो हिसाब कर दो. अपना काटकर मेरा मुझे दे दो.तब से वह वैसा ही कर रहा है.बहन दो -चार घरों में कुछ काम कर देती जिससे खाने का बन्दोंवस्त हो जाता और कुछ पुराने कपड़े भी मिल जाते जो तन ढकने के काम आ जाता.इस तरह से समय व्यतीत हो रहा था. सागर ने थोड़े पैसे जमा कर किराए का कमरा ले लिया . माँ ने जिनके पास मकान गिरवी रखे थे, उन्हें कोई संतान नहीं थी सो उन्होंने सीमा को अपनी बेटी बनाकर रख लिया. अब वह शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ती है. छोटा भाई जो है तो गूँगा पर कुशाग्र बुद्धि का है. वह एक गैरेज में काम करता है.दोनों भाइयों की इच्छा है कि अब सुषमा का नाम लिखवा दिया जाय, वह अपनी पढ़ाई पूरी कर ले. तबतक हमदोनो भाई मिलकर कुछ पैसे इकट्ठे कर एक छोटा सा अपना घर बना लेंगे.सागर की यह दास्तान सुन ऑंखें नम हो गईं पर उसकी कर्मठता पर दिल गद – गद हो उठा.ईश्वर दुख के साथ धैर्य देता है और उससे बाहर निकलने के लिए सद्बुद्धि भी.सागर इसका साक्षात् उदाहरण.